दिल्ली AIIMS ने एक बार फिर किया करिश्मा, देसी ब्रेन स्टेंट से 32 लोगों को मिली नई जिंदगी

दिल्ली। अब स्ट्रोक यानी लकवे के मरीजों को बचाने के लिए भारत को विदेशी तकनीक पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। एम्स दिल्ली ने स्ट्रोक के इलाज के क्षेत्र में ऐसा काम कर दिखाया है, जिसने देश की हेल्थ भरोसा पैदा किया है।

एम्स में भारत में बने सबसे उन्नत ब्रेन स्टेंट ‘सुपरनोवा’ पर देश का पहला क्लिनिकल ट्रायल सफल रहा है। इसके जरिए 32 मरीजों का ट्रायल किया गया, जिन्हें स्ट्रोक से छुटकारा मिल गया। डॉक्टरों का दावा है कि इस देसी स्टेंट से मरीज के इलाज का खर्च कम आएगा। साथ ही तेजी से रिकवरी भी हो सकेगी।

एम्स के न्यूरोइमेजिंग ओर इंटरवेंशनल न्यूरोरेडियोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ. शैलेश बी. गायकवाड ने बताया कि ब्रेन स्ट्रोक के इलाज में देसी ब्रेन स्टेंट के लिए एक रिसर्च की गई। GRASSROOT (ग्रैविटी स्टेंट-रिट्रीवर सिस्टम फॉर रीपरफ्यूजन ऑफ लार्ज वेसल ऑक्लूजन स्ट्रोक ट्रायल) किया गया।

एम्स नई दिल्ली इसका केंद्र रहा। जबकि, देश के 6 बड़े मेडिकल इंस्टिट्यूट में इसकी रिसर्च हुई। इनमें अहमदाबाद, कोलकता, हैदराबाद, पुडुचेरी शहर शामिल हैं। ट्रायल के नतीजे इंटरनैशनल जर्नल Journal of Neurointerventional Surgery में प्रकाशित हुए हैं।

इस ट्रायल में 32 मरीज शामिल किए गए थे, जिनकी उम्र 18 साल से लेकर 85 साल है। जो ब्रेन स्ट्रोक से पीड़ित थे। इलाज के दौरान यह ट्रायल सफल रहा है। जो भारत में स्ट्रोक इलाज के लिए निर्णायक मोड़ है। अब हमारे पास अपनी तकनीक है, जो सुरक्षित और प्रभावी है। अब तक स्ट्रोक के गंभीर मामलों में इस्तेमाल होने वाले स्टेंट ज्यादातर विदेश से आते थे, जो महंगे भी होते थे। सुपरनोवा स्टेंट पूरी तरह भारत में विकसित किया गया है और इसे भारत की जनसंख्या को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। क्योंकि भारत में स्ट्रोक कम उम्र में होता है।

डॉ. गायकवाड ने इस क्लिनिकल ट्रायल में विशेष रूप से डॉ. मंजरी त्रिपाठी, डॉ. रोहित भाटिया, डॉ. अचल श्रीवास्तव, डॉ. विष्णु, डॉ. अवध के. पंडित, डॉ. राजेश सिंह, डॉ. आयुष अग्रवाल और डॉ. सव्यसाची जैन के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि 32 मरीज के अलावा आगे भी अन्य मरीजों का इस ब्रेन स्टेंट से ट्रायल किया जाएगा।

एक्सपर्ट के अनुसार, भारत मे हर साल करीब 17 लाख लोग स्ट्रोक का शिकार होते हैं। कई मरीज समय पर इलाज न मिलने से अपंग हो जाते है या जान गंवा देते हैं। एम्स की न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. दीप्ति विभा के अनुसार, यह तकनीक इलाज को तेज बनाएगी। साथ ही खर्च कम करेगी और ज्यादा मरीजों तक समय पर मदद पहुंचाएगी। दावा है कि यह उपलब्धि भारत को ग्लोबल मेडिकल रिसर्च मैप पर और मजबूत करेगी।

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