अमेरिका ने भारत की तरफ मोड़ा हथियारों का मुंह, रूस की दोस्ती अब छूट गई पीछे

नई दिल्ली। भारत भले ही रूस पर ज्यादा भरोसा करता हो और रूस भरोसेमंद दोस्त भी साबित होता रहा हो, मगर हकीकत ये है कि भारत की पीठ में छुरा भोंकने वाला अमेरिका ही हमारा बड़ा सैन्य पार्टनर बनता जा रहा है।

भारत पर 50 फीसदी भारी-भरकम सख्त टैरिफ लगाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते 1 सितंबर को सरेआम एक झूठ बोला था। उन्होंने भारत से ‘एकतरफा संबंधों’ पर सवाल उठाया था। ट्रंप ने कहा था कि भारत अपना ज्यादातर तेल और सैन्य हथियार रूस से खरीदता है और रूस के मुकाबले अमेरिका से बहुत कम ये चीजें खरीदता है। तथ्य इसके उलट है। अब नया भारत अमेरिका से एडवांस मिलिट्री डील कर रहा है। इस बात को समझते हैं।

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2008 से पहले भारत-अमेरिका हथियारों की बिक्री केवल 23.3 करोड़ डॉलर की थी। इसमें कुछ काउंटर बैटरी रडार और एक सेकेंडहैंड युद्धपोत भी शामिल था। 2008 से भारत ने अमेरिका से 24 अरब डॉलर मूल्य का सैन्य हार्डवेयर खरीदा है। जेट इंजन, ड्रोन, तोपखाने के गोले, बख्तरबंद वाहन, टैंक-रोधी मिसाइल और टॉरपीडो के लिए अनुमानित 5 अरब डॉलर के हथियार सौदे पाइपलाइन में हैं और आगे चलकर संभावित रूप से अरबों डॉलर के हथियारों की बिक्री होगी। अमेरिका अब भारत का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य आपूर्तिकर्ता है, जो रूसी संघ के ठीक पीछे है। यह एक बड़ी उपलब्धि है।

2025 में ट्रंप के टैरिफ युद्ध के कारण भारत-अमेरिका संबंध 1998 के पोखरण-2 परमाणु परीक्षणों के बाद से अपने सबसे निचले स्तर पर हैं। परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने भारत के सी किंग और सी हैरियर जेट विमानों के बेड़े के लिए आपूर्ति में देरी कर दीं। वहीं, एलसीए तेजस हल्के लड़ाकू विमानों के लिए इंजन देने में भी देरी कर दी। भारत के रक्षा मंत्रालय ने एक रिपोर्ट का खंडन किया जिसमें कहा गया था कि भारत ने अमेरिका के साथ हथियारों के सौदे रोक दिए हैं। हथियारों की पाइपलाइन अभी भी सक्रिय है। रिपोर्ट को ‘झूठा और मनगढ़ंत’ बताते हुए, रक्षा मंत्रालय ने कहा कि अमेरिकी टैरिफ के बावजूद अमेरिका से खरीद जारी है।

भारत अमेरिका के बाहर बोइंग सी-17 ग्लोबमास्टर III और बोइंग पी-8आई पोसाइडन एएसडब्ल्यू विमानों का सबसे बड़ा संचालक है। रक्षा व्यापार अमेरिका-भारत सुरक्षा साझेदारी का एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभरा है। अमेरिकी कांग्रेस ने 2016 में भारत को ‘प्रमुख रक्षा साझेदार’ घोषित किया था। मार्च 2025 की कांग्रेसनल रिसर्च सर्विसेज की एक रिपोर्ट में कहा गया है-ट्रंप प्रशासन के पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिका-भारत सुरक्षा संबंध अमेरिकी एशिया नीति का एक प्रमुख पहलू बन गए थे।

अमेरिकी सैन्य हार्डवेयर ने पुराने सोवियत उपकरणों का स्थान ले लिया है। भारतीय वायुसेना के मध्यम-उठाने वाले विमान बेड़े में लॉकहीड मार्टिन सी-130जे और सी-17 ने सोवियत निर्मित आईएल-76 विमानों को पूरी तरह से पीछे छोड़ दिया है। बोइंग अपाचे हेलीकॉप्टर गनशिप ने वायु सेना के सोवियत निर्मित एमआई-24 और एमआई-35 सशस्त्र हेलीकॉप्टरों की जगह ले ली है। पी-8आई पोसाइडन ने सोवियत निर्मित टीयू-142 लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमान की जगह ले ली है, और सिकोरस्की एसएच-2 रोमियो ने सोवियत का-25 और का-28, साथ ही ब्रिटिश सी किंग एमके42बी पनडुब्बी-शिकार हेलीकॉप्टरों की जगह ले ली है। भारतीय सेना की मुख्य युद्ध राइफल न्यू हैम्पशायर में निर्मित एसआईजी 716 है।

रिपोर्ट के अनुसार, अरबों डॉलर के अमेरिकी सौदे पाइपलाइन में हैं, जिनमें भारत के एलसीए तेजस लड़ाकू विमानों के लिए उन्नत जनरल इलेक्ट्रिक जीई F-414 जेट इंजन के संयुक्त उत्पादन की योजना, स्ट्राइकर पैदल सेना लड़ाकू वाहनों और जेवलिन एंटी-टैंक मिसाइलों के सह-उत्पादन सौदे शामिल हैं। भारत कैलिफ़ोर्निया स्थित जनरल एटॉमिक्स द्वारा निर्मित 31 सशस्त्र एमक्यू-9बीसी गार्जियन और स्काईगार्डियन मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी) भी 4 अरब डॉलर में खरीदेगा। ऐसे में यह रिश्ता एकतरफा कतई नहीं है।

जब 2010 के आसपास भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी शुरू हुई, तब भारत अपने सैन्य उपकरणों का लगभग 72 प्रतिशत रूस से आयात करता था। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, रूसी हथियारों का आयात अब आधा होकर केवल 36 प्रतिशत रह गया है। भारत ने रूस के डिफेंस सिस्टम S-400 लंबी दूरी की वायु रक्षा मिसाइलें, परमाणु ऊर्जा से चलने वाली हमलावर पनडुब्बी खरीदी है।

Hamara Sankalp Nasha Mukti Kendra Haldwani

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