जिला न्यायालय परिसर में दो दिवसी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित

देहरादून। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण नैनीताल के दिशा निर्देशानुसार एवं माननीय जिला न्यायाधीश महोदय /अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकरण नैनीताल श्री सुबीर कुमार जी के मार्गदर्शन में सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण नैनीताल श्रीमती बीनू गुलयानी द्वारा , जिला न्यायालय परिसर में मानसिक बीमारी वाले व्यक्तियों और बौद्धिक विकलांग व्यक्तियों के लिए कानूनी सेवा इकाई का दो दिवसी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें प्रशिक्षण के दौरान बताया की मानसिक स्वास्थ्य सेवा अधिनियम, 2017: मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवा और सेवाएँ प्रदान करने और मानसिक स्वास्थ्य सेवा और सेवाएँ प्रदान करने के दौरान ऐसे व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा और संवर्धन करने के लिए MHCA को अधिनियमित किया गया था। MHCA मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों के कई अधिकारों को सूचीबद्ध करता है। MHCA की धारा 27 में कहा गया है कि मानसिक बीमारी से पीड़ित सभी व्यक्ति अधिनियम के तहत दिए गए अपने किसी भी अधिकार का प्रयोग करने के लिए निःशुल्क कानूनी सेवाएँ प्राप्त करने के हकदार हैं। यह मजिस्ट्रेट, पुलिस अधिकारियों, हिरासत संस्थानों के प्रभारी व्यक्तियों, चिकित्सा अधिकारियों या मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठान (MHE) के प्रभारी मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों पर यह कर्तव्य डालता है कि वे मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को LSA अधिनियम या अन्य लागू कानूनों या अदालती आदेशों के तहत निःशुल्क कानूनी सहायता के उनके अधिकार के बारे में सूचित करें। एमएचसीए सरकार द्वारा संचालित या वित्तपोषित सेवाओं से मानसिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुँचने का अधिकार सुनिश्चित करता है, मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों की गरिमा को बनाए रखता है, और उन्हें गोपनीयता का अधिकार, सामुदायिक जीवन का अधिकार, क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक उपचार से सुरक्षा का अधिकार, समानता और गैर-भेदभाव का अधिकार और चिकित्सा रिकॉर्ड तक पहुँच जैसे अधिकार प्रदान करता है। यह एक अग्रिम निर्देश प्रस्तुत करता है जो व्यक्तियों को उनके पसंदीदा उपचार विधियों की रूपरेखा बनाने और ऐसे समय के लिए प्रतिनिधि नियुक्त करने की अनुमति देता है जब वे निर्णय लेने में असमर्थ हो सकते हैं। अधिनियम आत्महत्या को अपराध से मुक्त करता है, इसे गंभीर तनाव का परिणाम मानता है। यह ऐसे व्यक्तियों को देखभाल, उपचार और पुनर्वास प्रदान करने के लिए उपयुक्त सरकार पर दायित्व डालता है ताकि ऐसे व्यक्तियों द्वारा आत्महत्या का पुनः प्रयास करने के जोखिम को कम किया जा सके। विकलांग व्यक्तियों के लिए समानता, सम्मान और अखंडता के सम्मान का अधिकार; समुदाय में रहने का अधिकार; क्रूरता और अमानवीय व्यवहार से सुरक्षा; और दुर्व्यवहार, हिंसा और शोषण से सुरक्षा सहित कई अधिकारों की रूपरेखा दी गई है। विकलांग व्यक्तियों को विकलांगता के आधार पर भेदभाव किए बिना किसी भी न्यायालय, न्यायाधिकरण, प्राधिकरण, आयोग या न्यायिक या अर्ध-न्यायिक या जांच शक्तियों वाले किसी अन्य निकाय तक पहुँचने के अधिकार का प्रयोग करने में सक्षम बनाने के लिए आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम की धारा 12 उचित सरकार पर एक अधिदेश निर्धारित करती है। सरकार विकलांग व्यक्तियों के लिए उपयुक्त सहायता उपाय लागू करने के लिए भी कदम उठाएगी, खासकर उन लोगों के लिए जो परिवार से बाहर रहते हैं और जिन्हें कानूनी अधिकारों का प्रयोग करने के लिए उच्च समर्थन की आवश्यकता होती है। सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए भी कदम उठाएगी कि सार्वजनिक दस्तावेज सुलभ प्रारूप में हों; फाइलिंग विभागों और अन्य कार्यालयों में फाइलिंग, भंडारण आदि को सक्षम करने के लिए आवश्यक उपकरण हों। सुलभ प्रारूपों में विकलांग व्यक्तियों द्वारा दी गई गवाही, तर्क या राय को उनकी पसंदीदा भाषा और संचार के माध्यमों में रिकॉर्ड करने के लिए आवश्यक सुविधाएं और उपकरण उपलब्ध कराना। यह आगे एनएएलएसए और एसएलएसए को उचित समायोजन सहित प्रावधान करने का आदेश देता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विकलांग व्यक्तियों को किसी भी योजना, कार्यक्रम, सुविधा या सेवाओं तक समान पहुंच हो। इसके अलावा आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम की धारा 7 (4) (सी) में कहा गया है कि कोई भी पुलिस अधिकारी जिसे शिकायत प्राप्त होती है या अन्यथा किसी विकलांग व्यक्ति के प्रति दुर्व्यवहार, हिंसा या शोषण के बारे में पता चलता है, वह पीड़ित व्यक्ति को मुफ्त कानूनी सहायता के अधिकार के बारे में सूचित करेगा। आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम की धारा 13 में कहा गया है कि उपयुक्त सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि विकलांग व्यक्ति जीवन के सभी पहलुओं में दूसरों के साथ समान आधार पर कानूनी क्षमता का आनंद लें और कानून के समक्ष किसी भी अन्य व्यक्ति के समान हर जगह समान मान्यता का अधिकार प्राप्त करें। आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम की धारा 14 में यह आदेश दिया गया है कि यदि मानसिक बीमारी या बौद्धिक विकलांगता वाले व्यक्ति कानूनी निर्णय लेने में असमर्थ हैं, तो राज्य या नामित प्राधिकारी सीमित संरक्षक नियुक्त कर सकता है या पूर्ण संरक्षकता स्थापित कर सकता है। यह अभिभावक कानूनी रूप से बाध्यकारी निर्णय लेने में सहायता करेगा, हमेशा संबंधित व्यक्ति के परामर्श से। आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम की धारा 15 में कहा गया है कि उपयुक्त सरकार समुदाय को संगठित करने और सामाजिक जागरूकता पैदा करने के लिए एक या अधिक अधिकारियों को नामित करेगी, ताकि विकलांग व्यक्तियों को उनकी कानूनी क्षमता का प्रयोग करने में सहायता मिल सके। इस धारा में आगे कहा गया है कि इस प्रकार नामित अधिकारी, संस्थानों में रहने वाले विकलांग व्यक्तियों और उच्च समर्थन की आवश्यकता वाले लोगों को उनकी कानूनी क्षमता का प्रयोग करने में सक्षम बनाने के लिए उपयुक्त सहायता व्यवस्था स्थापित करने के लिए उपाय करेंगे। प्रशिक्षण में गठित इकाई में डिप्टी लीगल एड काउंसिल पैनल अधिवक्ता पैरालेगल वॉलिंटियर अधिकार मित्र उपस्थित रहे।

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