आज हमें मातृभाषाओं के विस्तृत संदर्भ को समझने की जरूरत है : प्रो. लोहनी

हल्द्वानी। उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के मानविकी विद्याशाखा द्वारा अंतर राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की पूर्व संध्या पर मातृभाषा उत्सव एवं विचार विमर्श सत्र का आयोजन हुआ।

इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि मातृभाषाओं का यह उत्सव वोकल फॉर लोकल के लिए आवश्यक है। भाषाएं वह दरवाजे हैं जिनसे सीखने के नए आयाम खुलते हैं। विश्व बंधुत्व की भावना भाषाओं को उदारता से देखने से ही आएगी। भाषाई ताकत प्रदर्शन से नहीं भाषाई संप्रभुता की स्वीकार्यता से आएगी। आज हमें मातृभाषाओं के विस्तृत स्वरूप को समझने की जरूरत है।

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय भाषाओं के उन्नयन के प्रति प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि प्राकृत, पालि और अपभ्रंश जैसी प्राचीन भाषाओं के साथ साथ स्पेनिश, चीनी और जापानी जैसी विदेशी भाषा में पाठ्यक्रम की शुरुआत विश्वविद्यालय में शीघ्र ही होगी। यह विश्वविद्यालय की भाषा नीति को तो बताता ही है इसके साथ ही भाषाओं में रोजगार की संभावनाओं को भी रेखांकित करता है।

यह पाठ्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप क्लासिकल एवं आधुनिक भाषाओं के संदर्भ से जुड़ कर विद्यार्थियों के लिए रोजगार उपलब्ध कराने में सहायक होंगे। भारतीय पहचान की वैश्विकता का मूल मंत्र मातृभाषाओं के उन्नयन से ही संभव हो पाएगा। वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा के लिए भी भाषाई महत्व को समझना आवश्यक हो जाता है।

इस अवसर पर ‘मातृभाषा और वसुधैव कुटुम्बकम’ विषय पर आयोजित व्याख्यान की शुरुआत करते हुए अतिथियों का स्वागत और विषय प्रवेश डॉ. शशांक शुक्ल ने किया, उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि भाषा की अस्मिता के सम्मान के लिए यूनेस्को ने अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा की।

इस वर्ष गुणवत्ता परक शिक्षा के लिए मातृभाषाओं के योगदान को समझना अंतर राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का ध्येय है। यह उत्सव अधिनायकवाद के बरक्स संवेदना की भाषा एवं बहुसांस्कृतिक पहचान का विषय है।

अगले वक्ता के रूप में मानविकी विद्याशाखा के निदेशक प्रो. गिरिजा प्रसाद पांडे ने कहा कि हम भाषा के माध्यम से अपने को समझने की कोशिश कर रहे हैं। आज जब सात हजार से अधिक भाषाएं बोली जा रही है इस विशालता को हमें नए तरह से समझने की कोशिश करनी है। भाषा का मसला संज्ञानात्मकता का मसला है। भाषा का साठ फीसदी संख्या एशिया अफ्रीका में एवं चालीस फीसदी संख्या अन्य की है ऐसे में भाषाई विविधता को समझना वैश्विक संस्कृति को समझना है। तकनीक ने भाषाई संवाद को आसान बनाया है।

व्याख्यान के पहले वक्ता लिस्बन यूनिवर्सिटी, पुर्तगाल के भाषाविद डॉ. शिव कुमार सिंह ने बताया कि मातृभाषा का अर्थ केवल अपनी भाषा नहीं है मातृभाषा के विस्तार में वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा शामिल है।

आज मातृभाषा केवल बाजार की भाषा नहीं है बल्कि भावनाओं की संलग्नता एवं आत्मीयता का विषय है। मातृभाषा हमारे समझ को भी आत्मीय बनाता है। चीजों को समझने के लिए रटने पर नहीं समझ के साथ एक आत्मीय रिश्ता बनाने के लिए मातृभाषा अतिमहत्वपूर्ण है। हमें किसी खास भाषा को पॉवर पॉलिटिक्स और दिखावा का विषय नहीं बनाना चाहिए। अपनी भाषा हमें नवाचार के लिए प्रेरित करती है।

डॉ. सिंह ने अपनी बात रखते हुए मातृभाषाओं का संरक्षण नहीं किया गया तो यह मनुष्य की अस्मिता को भी प्रभावित करेगा। हमें भाषाओं को मनुष्य के पहचान के साथ देखने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि भाषाई समावेशन वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा का ही विस्तार है।

विचार सत्र में अतिथि व्याख्यान देते हुए हैम्बर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी के भाषाविद डॉ. रामप्रकाश भट्ट ने कहा कि भाषा की मुख्य भूमिका सामाजिक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य, शैक्षणिक संदर्भ, औपनिवेशिक एवं राजनीतिक संदर्भ को समझने से जुड़ा हुआ है। भाषा ज्ञान परंपरा और विरासत के प्रश्न से जुड़ा हुआ है। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं बल्कि स्मृति, परंपरा और विश्वदृष्टि का आधार है। मातृभाषाएं सांस्कृतिक स्मृति, पहचान और ज्ञान प्रणाली का भंडार हैं।

डॉ. भट्ट ने कहा कि भाषा देशिक पहचान है। भाषा महज प्रादेशिक नहीं बल्कि मनुष्य की जातीय पहचान का हिस्सा है। भाषा में मातृभाषा के शब्दों को संरक्षित करने और आधुनिक परिदृश्य में पुनर्परिभाषिक करने की जरूरत है। मातृभाषा उत्सव की शुरुआत भारत की बहुभाषिकता :एक सांगीतिक प्रस्तुति मिले सुर मेरा तुम्हारा के साथ हुई।

इसी क्रम में संगीत विभाग के शिक्षार्थियों ने देवेंद्र आर्या ने कुमाऊनी – गढ़वाली भाषा में गायन किया। इनके साथ तबले पर संदीप सिंह सोढ़ी एवं गिटार पर कमल जीत मेहता ने संगत किया।

उत्सव के क्रम को आगे बढ़ाते हुए मातृभाषा में काव्यपाठ का आयोजन हुआ। जिसमें संस्कृत में डॉ. नीरज जोशी, कुमाऊनी में डॉ. मेघा पंत एवं डॉ. अनिल कार्की, नेपाली में डॉ. अनिल कार्की, गढ़वाली में डॉ. कांता प्रसाद एवं डॉ. विवेक ममगाई, अंग्रेजी में डॉ. नगेंद्र गंगोला, उर्दू में शाने अली, अवधी में गुलाम जिलानी, अपभ्रंश और भोजपुरी में डॉ. कुमार मंगलम एवं हिंदी में डॉ. दीपिका वर्मा ने कविताओं का पाठ किया।

कार्यक्रम की शुरुआत मातृभाषा में हस्ताक्षर अभियान से हुआ। हस्ताक्षर अभियान का उद्घाटन विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने किया। इसके पश्चात विश्वविद्यालय के सभी सदस्यों ने मातृभाषा में हस्ताक्षर किया।

इस उत्सव में विश्वविद्यालय के शोधार्थियों के लिए आयोजित निबंध प्रतियोगिता में प्रथम स्थान श्री विकास जोशी, इतिहास विभाग, द्वितीय स्थान सुश्री फरहा नाज़, शिक्षाशास्त्र विभाग, तृतीय स्थान हर्षिता मेहता, पत्रकारिता विभाग और सांत्वना पुरस्कार गणेश चन्द्र, पत्रकारिता विभाग एवं सुनीता भास्कर पत्रकारिता विभाग के शोधार्थियों ने प्राप्त किया।

कार्यक्रम का संचालन हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. राजेंद्र कैड़ा ने किया। अतिथियों का परिचय हिंदी विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ. पुष्पा बुढलाकोटी ने दिया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अनिल कार्की ने किया।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विद्याशाखाओं के निदेशक, समस्त शिक्षक, शोधार्थी एवं कार्मिक मौजूद रहे।

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